गाय के घी के फायदे : Gay ke Ghee ke Fayde

गाय का घी गुणों की दृष्टि से मधुर, शीतल, स्निग्ध तथा गुरु (पचने में भारी) होता है और यह हृदय के लिए सदा पथ्य, कल्याणकारी एवं प्रिय माना गया है। यह नेत्रों की ज्योति को बढ़ाने वाला, शरीर की कांति को निखारने वाला तथा बुद्धि और मेधा शक्ति को विकसित करने वाला होता है। गाय का घी भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है, जठराग्नि को प्रदीप्त करता है तथा वीर्य, ओज, आयु, बल और यौवन की वृद्धि में सहायक होता है। घी के नियमित सेवन से सात्त्विकता, सौम्यता, सुंदरता और मेधाशक्ति में वृद्धि होती है।

  • गाय का घी स्निग्ध, गुरु और शीत गुणों से युक्त होने के कारण वात दोष को शांत करता है। शीतवीर्य होने के कारण यह पित्त दोष का शमन करता है तथा समान गुण वाले कफ दोष को कफनाशक औषधियों के संस्कार के माध्यम से नियंत्रित करता है। यह शरीर की जलन को शांत करता है, शरीर को कोमल बनाता है, स्वर को मधुर करता है तथा वर्ण और कांति में वृद्धि करता है।
  • शरद ऋतु में स्वस्थ व्यक्ति को घी का सेवन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इस ऋतु में स्वाभाविक रूप से पित्त का प्रकोप बढ़ जाता है। आयुर्वेद में कहा गया है— “पित्तघ्नं घृतम्”—अर्थात घी पित्त और पित्तजन्य विकारों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ होता है। संपूर्ण भारत में सामान्यतः 16 सितंबर से 14 नवंबर तक शरद ऋतु मानी जाती है।
  • पित्तजन्य विकारों की स्थिति में शरद ऋतु के दौरान घी का सेवन प्रातःकाल या दोपहर में करना अधिक उपयुक्त माना गया है। घी सेवन के पश्चात गुनगुना पानी पीना चाहिए, जिससे घी शरीर के सभी स्रोतों में फैलकर अपना प्रभाव प्रभावी रूप से दिखा सके।
  • अनेक रोगों में गाय के घी का उपयोग अन्य औषध द्रव्यों के साथ मिलाकर किया जाता है। घी के माध्यम से औषधियों के गुण शरीर में शीघ्रता से प्रसारित होते हैं और उनकी प्रभावशीलता में विशेष वृद्धि होती है। इसी कारण त्रिफला घृत, अश्वगंधा घृत जैसे औषधि-सिद्ध घृतों का प्रयोग विभिन्न रोगों में किया जाता है।
  • अन्य औषध द्रव्यों से गाय के घी को संस्कारित करने की विधि इस प्रकार है— औषध द्रव्य का स्वरस (कूटकर निकाला गया रस) या कल्क (चूर्ण) 50 ग्राम लें। इसमें 200 ग्राम गाय का घी और 800 ग्राम पानी मिलाकर धीमी आँच पर पकाएँ। जब सारा पानी जल जाए और घी कल्क से अलग होकर स्वच्छ दिखाई देने लगे, तब घी को उतारकर छान लें और किसी स्वच्छ बोतल में संग्रहित कर लें।
  • औषधीय दृष्टि से घी जितना पुराना होता है, उतना ही अधिक गुणकारी माना जाता है। पुराना घी उन्माद, मिर्गी जैसे मानसिक रोगों तथा मोतियाबिंद जैसे नेत्र रोगों में विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होता है। यह बलवर्धक है तथा शरीर और इंद्रियों—आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा—को पुनः नवजीवन प्रदान करता है।
  • आयुर्वेद के अनुसार जो व्यक्ति नेत्र ज्योति बढ़ाना चाहते हों, सदा निरोगी और बलवान रहना चाहते हों, दीर्घायु की कामना करते हों तथा ओज, स्मरण शक्ति, धारण शक्ति, मेधाशक्ति, जठराग्नि का बल, बुद्धिबल, शरीर की कांति और नाक-कान आदि इंद्रियों की शक्ति बनाए रखना चाहते हों, उन्हें नियमित रूप से घी का सेवन अवश्य करना चाहिए। जिस प्रकार सूखी लकड़ी शीघ्र टूट जाती है, उसी प्रकार घी का सेवन न करने वालों का शरीर भी शीघ्र दुर्बल हो जाता है।

देसी गाय के घी के औषधीय प्रयोग

आधासीसी

प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल नाक में देसी गाय के घी की 2–3 बूँदें डालने से लगभग सात दिनों में आधासीसी में उल्लेखनीय लाभ प्राप्त होता है।

चौथिया ज्वर, उन्माद एवं अपस्मार (मिर्गी)

इन रोगों में पंचगव्य घी का सेवन कराने से रोगों का शमन होता है और रोगी की स्थिति में सुधार देखा जाता है।

त्वचा के जलने पर

यदि त्वचा जल जाए तो उस स्थान पर धोया हुआ घी लगाने से बिना किसी प्रकार की विकृति के घाव भर जाता है। धोया हुआ घी बनाने के लिए घी को पानी में मिलाकर अच्छी तरह मथा जाता है और जब वह एकरस हो जाए, तब पानी को अलग कर दिया जाता है। इस प्रकार तैयार किया गया घी जलन और घाव में विशेष लाभकारी होता है।

शतधौत घृत

शतधौत घृत का अर्थ है— सौ बार धोया हुआ घी। इस घृत से मालिश करने पर हाथ-पैरों की जलन और सिर की गर्मी चमत्कारिक रूप से शांत हो जाती है।

शतधौत घृत बनाने की विधि

एक बड़े काँसे के बर्तन में लगभग 250 ग्राम गाय का घी लें। उसमें लगभग 2 लीटर शुद्ध ठंडा पानी डालें और हाथ से इस प्रकार मथें, जैसे घी और पानी का मिश्रण तैयार किया जा रहा हो। जब पानी घी से अलग हो जाए, तब सावधानीपूर्वक पानी निकाल दें। इसी प्रकार हर बार ताजा पानी लेकर घी को सौ बार धोएँ और प्रत्येक बार पानी अलग करते रहें। अंत में जो घी शेष बचता है, वह अत्यंत शीतलता प्रदान करने वाला होता है। इस घी से हाथ, पैर और सिर पर मालिश करने से शरीर की अतिरिक्त गर्मी शांत हो जाती है। कई वैद्य परंपरानुसार घी को 120 बार तक भी धोते हैं, जिससे उसका शीतल प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।

गाय के घी के नुकसान और सावधानियां

(Gaay ke Ghee ke Nuksan in Hindi)

अत्यधिक शीत ऋतु में या कफ प्रधान प्रकृति वाले व्यक्ति यदि रात्रि के समय घी का सेवन करते हैं, तो इससे पेट में अफरा, भोजन के प्रति अरुचि, उदरशूल तथा पांडु रोग जैसे विकार उत्पन्न हो सकते हैं। इसलिए ऐसी परिस्थितियों में घी का सेवन केवल दिन के समय ही करना उचित माना जाता है।

जिन व्यक्तियों के शरीर में कफ और मेद की अधिकता हो, जो नियमित रूप से मंदाग्नि से पीड़ित रहते हों, जिन्हें भोजन में अरुचि रहती हो, बार-बार सर्दी लगती हो, उदर रोग या आम दोष की समस्या हो—ऐसे लोगों को उन अवस्थाओं में घी का सेवन नहीं करना चाहिए।

नोट: किसी भी दवा, उपाय या आयुर्वेदिक नुस्खे का प्रयोग हमेशा योग्य वैद्य या चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए, ताकि संभावित दुष्प्रभावों से बचा जा सके।

 


0 Comments

Leave a Reply

Avatar placeholder

Your email address will not be published. Required fields are marked *